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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
यदि जानाति चार्वाकः परिव्राड्वाग्विशारदः |  ३८   क
करिष्यति महाभागो ध्रुवं सोऽपचितिं मम ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति