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वन पर्व
अध्याय २८१
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यम उवाच
निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानय़ा गिरा; स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुय़ुक्तय़ा |  २५   क
वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं; ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति