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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
कुतः श्रमो भर्तृसमीपतो हि मे; यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा |  २८   क
यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः; सुरेश भूय़श्च वचो निवोध मे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति