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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः; स्वमेव राज्यं स लभेत पार्थिवः |  ३१   क
जह्यात्स्वधर्मं न च मे गुरुर्यथा; द्वितीय़मेतं वरय़ामि ते वरम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति