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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गानि चैव सावित्रि हृदय़ं दूय़तीव च |  ४   क
अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षय़े मितभाषिणि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति