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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
आत्मन्यपि न विश्वासस्तावान्भवति सत्सु यः |  ४१   क
तस्मात्सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणय़मिच्छति ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति