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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
ते हन्यमानाः पार्थेन त्वदीय़ा व्यथिता भृशम् |  ३६   क
स्वानेव वहवो जघ्नुर्विद्रवन्तस्ततस्ततः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति