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वन पर्व
अध्याय २८१
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यम उवाच
शतं सुतानां वलवीर्यशालिनां; भविष्यति प्रीतिकरं तवावले |  ४५   क
परिश्रमस्ते न भवेन्नृपात्मजे; निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति