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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षय़ाम्यहम् |  ५   क
तत्स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातुं शक्तिरस्ति मे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति