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वन पर्व
अध्याय २८१
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यम उवाच
यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं; मनोनुकूलं सुपदं महार्थवत् |  ५०   क
तथा तथा मे त्वय़ि भक्तिरुत्तमा; वरं वृणीष्वाप्रतिमं यतव्रते ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति