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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तान्पाशान्मुक्त्वा वैवस्वतो यमः |  ५४   क
धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमव्रवीत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति