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वन पर्व
अध्याय १९२
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विष्णुरु उवाच
एवं सञ्छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा |  २३   क
उत्तङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति