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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ि पुत्रशतं चैव सत्यवाञ्जनय़िष्यति |  ५७   क
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रिय़ाः पुत्रपौत्रिणः |  ५७   ख
ख्यातास्त्वन्नामधेय़ाश्च भविष्यन्तीह शाश्वताः ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति