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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
तेषामार्तस्वरं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः |  ८९   क
मुक्ताः पर्यपतन्राजन्मृद्नन्तः शिविरे जनम् ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति