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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान् |  ५९   क
निवर्तय़ित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं यय़ौ ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति