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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपलभ्य ततः सञ्ज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः |  ६६   क
दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति