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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वय़ा सह सुमध्यमे |  ६७   क
ततः पाटय़तः काष्ठं शिरसो मे रुजाभवत् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति