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वन पर्व
अध्याय ८३
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पुलस्त्य उवाच
ततः कालञ्जरं गत्वा पर्वतं लोकविश्रुतम् |  ५३   क
तत्र देवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति