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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत |  ७२   क
विगाढा रजनी चेय़ं निवृत्तश्च दिवाकरः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति