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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
नक्तञ्चराश्चरन्त्येते हृष्टाः क्रूराभिभाषिणः |  ७३   क
श्रूय़न्ते पर्णशव्दाश्च मृगाणां चरतां वने ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति