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वन पर्व
अध्याय २८१
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सत्यवानु उवाच
वनं प्रतिभय़ाकारं घनेन तमसा वृतम् |  ७५   क
न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति