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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्षः स्थितो ज्वलन् |  ७६   क
वाय़ुना धम्यमानोऽग्निर्दृश्यतेऽत्र क्वचित्क्वचित् ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति