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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुजं त्वाभिलक्षय़े |  ७८   क
न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति