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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः; प्रत्युद्ययुः कुरवस्तं समन्तात् |  ३   क
भीमस्य वाहाग्र्यमुदारवेगं; समन्ततो वाणगणैर्निजघ्नुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति