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वन पर्व
अध्याय २८१
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सत्यवानु उवाच
मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः |  ९३   क
जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मय़ेति ह |  ९३   ख
तय़ोः प्रिय़ं मे कर्तव्यमिति जीवामि चाप्यहम् ||  ९३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति