शान्ति पर्व  अध्याय २८२

पराशर उवाच

अजिह्मैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रय़ोक्तृभिः |  १२   क
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति