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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
तस्माद्यो रक्षति नृपः स धर्मेणाभिपूज्यते |  १४   क
अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति