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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं निय़तेन्द्रिय़ः |  १५   क
अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात्परिहीय़ते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति