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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा |  २   क
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रय़ोजय़ेत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति