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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
दमेन शोभते विप्रः क्षत्रिय़ो विजय़ेन तु |  २१   क
धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति