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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः |  ३   क
नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति