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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्वरम् |  ५   क
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवैहि मे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति