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वन पर्व
अध्याय २८२
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गौतम उवाच
समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे |  १२   क
वाय़ुभक्षोपवासश्च कुशलानि च यानि मे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति