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वन पर्व
अध्याय २८२
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शिष्य उवाच
उपाध्याय़स्य मे वक्त्राद्यथा वाक्यं विनिःसृतम् |  १४   क
नैतज्जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति