वन पर्व  अध्याय २८२

मार्कण्डेय़ उवाच

एवमाश्वासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभिः |  २०   क
तांस्तान्विगणय़न्नर्थानवस्थित इवाभवत् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति