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वन पर्व
अध्याय २८२
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व्राह्मणा ऊचुः
समागमेन पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च |  २३   क
चक्षुषश्चात्मनो लाभात्त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति