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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽग्निं तत्र सञ्ज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि |  २५   क
उपासां चक्रिरे पार्थ द्युमत्सेनं महीपतिम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति