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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रागेव नागतं कस्मात्सभार्येण त्वय़ा विभो |  २८   क
विरात्रे चागतं कस्मात्कोऽनुवन्धश्च तेऽभवत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति