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वन पर्व
अध्याय २८२
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सत्यवानु उवाच
सुप्तश्चाहं वेदनय़ा चिरमित्युपलक्षय़े |  ३१   क
तावत्कालं च न मय़ा सुप्तपूर्वं कदाचन ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति