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वन पर्व
अध्याय २८२
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गौतम उवाच
श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् |  ३४   क
त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति