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वन पर्व
अध्याय २८२
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गौतम उवाच
त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात्सत्यं निरुच्यताम् |  ३५   क
रहस्यं यदि ते नास्ति किञ्चिदत्र वदस्व नः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति