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वन पर्व
अध्याय २८२
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सावित्र्यु उवाच
चतुर्वर्षशताय़ुर्मे भर्ता लव्धश्च सत्यवान् |  ४१   क
भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मय़ा चीर्णं स्थिरं व्रतम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति