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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव ते; वरस्त्रिय़ं तामृषय़ः समागताः |  ४४   क
नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा; शिवेन जग्मुर्मुदिताः स्वमालय़म् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति