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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
भिन्नैश्च परुषैः पादैः सव्रणैः शोणितोक्षितैः |  ५   क
कुशकण्टकविद्धाङ्गावुन्मत्ताविव धावतः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति