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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
तेषां दर्पः समभवत्प्रजानां धर्मनाशनः |  १०   क
दर्पात्मनां ततः क्रोधः पुनस्तेषामजाय़त ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति