शान्ति पर्व  अध्याय २८३

पराशर उवाच

ततो मोहपरीतास्ते नापश्यन्त यथा पुरा |  १२   क
परस्परावमर्देन वर्तय़न्ति यथासुखम् ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति