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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
तस्मिन्हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः |  १७   क
प्रावर्तन्त च वेदा वै शास्त्राणि च यथा पुरा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति