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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
नित्यं त्रय़ाणां वर्णानां शूद्रः शुश्रूषुरुच्यते |  २   क
क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नावृत्तिः पतति द्विजः |  २   ख
शूद्रकर्मा यदा तु स्यात्तदा पतति वै द्विजः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति