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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
न सङ्करेण द्रविणं विचिन्वीत विचक्षणः |  २४   क
धर्मार्थं न्याय़मुत्सृज्य न तत्कल्याणमुच्यते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति