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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा |  २९   क
आत्मभूतः सदा लोके चरेद्भूतान्यहिंसय़न् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति